साहस और बलिदान का प्रतीक स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा का शहादत दिवस मनाया

साहस और बलिदान का प्रतीक स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा का शहादत दिवस मनाया

सूरजगढ़(चंद्रकांत बंका) गाँधी कृषि फार्म सूरजगढ़ में आदर्श समाज समिति इंडिया के तत्वाधान में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश की आजादी के लिए प्राणों की आहुति देने वाली बूढ़ी गाँधी के नाम से विख्यात महान स्वतंत्रता सेनानी साहस और बलिदान का प्रतीक मातंगिनी हाजरा का शहादत दिवस मनाया। गाँधी परिवार के सदस्य धर्मपाल गाँधी, पूर्व पंचायत समिति सदस्य चाँदकौर, सुनील गाँधी, भतेरी, किरण देवी, सतीश कुमार, रवि कुमार, सोनू कुमारी, पिंकी, अंजू गाँधी आदि ने महान बलिदानी मातंगिनी हाजरा के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर नमन किया। सभा को संबोधित करते हुए अंजू गाँधी ने कहा- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे सेनानी रहे, जिनको वह पहचान नहीं मिलीं, जिसके वे हकदार थे। मातंगिनी हजारा ऐसी ही क्रांतिकारी महिला थीं। जब मातंगिनी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ीं, तो उनकी उम्र काफी थी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में अंग्रेजों ने 73 साल की उम्र में उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया, लेकिन उन्होंने मरते दम तक तिरंगे को नहीं गिरने दिया और अंतिम सांस तक उनके मुंह से वंदेमातरम् निकलता रहा। लोग इस महान महिला स्वतंत्रता सेनानी की जाबांज कहानी जानेंगे तो हैरत में पड़ जायेंगे। आदर्श समाज समिति इंडिया के अध्यक्ष धर्मपाल गाँधी ने स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा के बलिदान को याद करते हुए कहा- भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, मातंगिनी हाजरा अटूट दृढ़ संकल्प, साहस और बलिदान का एक ज्वलंत उदाहरण है। देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों की गोली खाने वाली मातंगिनी हाजरा के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता। स्वाधीनता के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली मातंगिनी हाजरा की वीरता और तामलुक की घटना का स्मरण बना रहे इसलिए दिसंबर 1974 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने महान वीरांगना की प्रतिमा का अनावरण किया। मातंगिनी हाजरा पहली महिला सेनानी थीं जिसकी मूर्ति आजाद भारत के कलकत्ता में स्थापित की गई थी। कसे हाथों से कंधे पर झंड़ा लिए और चेहरे पर दृढ़ संकल्प के भाव से बनी यह प्रतिमा आज भी उनकी वीरता का प्रतीक है। उनके नाम पर बहुत से स्कूल, कॉलोनियां का नामकरण किया गया। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकत्ता में ‘हाजरा मार्ग’ इस वीरांगना के नाम पर है। साल 2002 में भारत छोड़ो आंदोलन के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी कदम से कदम मिलाकर संघर्ष किया था। मातंगिनी हाजरा एक ऐसी ही बलिदानी माँ थीं, जिन्होंने अपनी अशिक्षा, वृद्धावस्था तथा निर्धनता को इस संघर्ष में आड़े नहीं आने दिया। मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 में ग्राम होगला, जिला मिदनापुर, पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ था। गरीबी के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह ग्राम अलीनान के 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया, पर दुर्भाग्य उनके पीछे पड़ा था। छह वर्ष बाद वह निःसन्तान विधवा हो गयीं। पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उससे बहुत घृणा करता था। अतः मातंगिनी एक अलग झोपड़ी में रहकर मजदूरी से जीवनयापन करने लगी। गाँव वालों के दुःख-सुख में सदा सहभागी रहने के कारण वे पूरे गाँव में माँ के समान पूज्य हो गयीं। गरीबी, अशिक्षा और विधवा होने का सामाजिक तिरस्कार झेल रहीं मातंगिनी हाजरा सशक्त और आत्मनिर्भर होने का बदलाव चाहती थीं। यही वजह थी कि महात्मा गांधी से प्रेरित होकर मातंगिनी हाजरा भारत के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हो गई। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 29 सितंबर 1942 को अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के साथ वीरता का परिचय देते हुए बंगाल के तामलुक क्षेत्र में ब्रिटिश पुलिस की गोलियों का सामना किया और देश की आजादी के लिए बलिदान दिया। मातंगिनी हाजरा की विरासत जीवित है, जो उन लोगों की अदम्य भावना का प्रमाण है जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना देखने का साहस किया। उनका बलिदान उन अनगिनत व्यक्तियों द्वारा चुकाई गई कीमत की मार्मिक याद दिलाता है जो अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ खड़े हुए थे। आज भी उनकी यादें पीढ़ियों को साहस, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए प्रेरित करती रहती हैं। ऐसी महान स्वतंत्रता सेनानी अमर बलिदानी को हम नमन करते हैं।

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